साहित्य

“दारोश” कहानी संग्रह के प्रकाशन के 25 वर्ष और उस पर आलोचना कृति

साहित्य के महा नगरों से बहुत दूर रहने वाले हम जैसे लेखकों के लिए छोटी छोटी खुशियां बहुत बड़ी होती है। दारोश संग्रह आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड से उस समय आया था जब कहानीकार के रूप में कोई जानता ही नहीं था। इस संग्रह तक पहुंचने की यात्रा बहुत संघर्षमय और अपनी प्रादेशिक साहित्यिक बिरादरी के बीच बहुत यातनाओं से भी भरी थी। इससे पूर्व हालांकि पंजा, आकाशबेल और पीठ पर पहाड़ तीन संग्रह आ चुके थे। पंजा और आकाशबेल मेरे लेखन का वह बचपन था जहां प्रोत्साहन की बहुत जरूरत होती है और वह मुझे आदरणीय प्रो.कुमार कृष्ण जी ने दिया जिन्होंने इन कहानी संग्रह को प्रकाशित करवाया। कुमार कृष्ण जी आज हिंदी के जानेमाने कवि और आलोचक हैं। इनके ब्लर्ब उन्होंने ही लिखे और उसके बाद वरिष्ठ आलोचक डॉक्टर हेमराज कौशिक जी ने अपनी आलोचना कृतियों में इन पर लिखा। हालांकि इनकी कहानियां बहुत कमजोर थी जो किसी बड़ी पत्रिका में नहीं छपी थी। परंतु उस दौर में कहानी विधा में आने के लिए इन्होंने नींव के पत्थर जैसी भूमिका निभाई। पीठ पर पहाड़ इलाहाबाद से आदरणीय शेखर जोशी जी के माध्यम से छपा था। मैं इसके लिए गुरुदेव कुमार कृष्ण, डॉक्टर हेमराज कौशिक और श्रद्धेय शेखर जोशी जी का कृतज्ञ हूं।

उन दिनों पहल पत्रिका की वजह से आदरणीय ज्ञानरंजन जी के संपर्क में आया और उन्हें जब इन पुस्तकों को भेजा तो एक लंबे पत्र में सलाह दी कि “हरनोट तुम्हारे पास बेहद कच्चा माल है, जहां से तुम कहानी में आ सकते हो”। यह मेरे लिए एक टर्निंग पॉइंट भी था और उसके बाद बहुत लग्न से मेहनत की, हालांकि अपने प्रदेश की बिपाशा और अन्य पत्र पत्रिकाओं को कभी भी मेरी कहानियों पसंद नहीं आई परंतु हंस, कथादेश, उदभावना, पश्यन्ती, वागर्थ, जनसत्ता आदि देश की सभी बड़ी पत्रिकाओं में कहानियां छपी। बड़ी खुशी तब हुई जब पहल में ज्ञानरंजन जी ने “बिल्लियां बतियाती हैं” कहानी छापी और साथ संग्रह की पांडुलिपि भी मंगवा ली। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कितनी बड़ी खुशी के पल थे। उन्होंने अपना आशीर्वाद संग्रह के ब्लर्ब लिख कर दिया और संग्रह आधार प्रकाशन को भेज दिया। कहानी में नया नाम था इसलिए छपने में काफी समय भी लगा परंतु आधार प्रकाशन के निदेशक देश निर्मोही जी ने इसे बहुत मन से वर्ष 2001 में प्रकाशित किया। दो वर्षों में इस संग्रह की प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह जी, प्रोफेसर सूरज पालीवाल जी और गौतम सान्याल जी सहित तकरीबन बहुत से आलोचकों और लेखकों ने इस पर लिखा। कहानी विधा में आने का यह संग्रह आधार से छपने के बाद “आधार” भी बना जिस पर जब अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान लंदन में मिला तो यह खूब चर्चित हुआ। आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी और कथा यूके परिवार का जो सम्मान लंदन में मिला वह अब तक का अनूठा और बड़ा अनुभव था। बिल्लियां बतियाती है कहानी का मंचन नेहरू भवन में अविस्मरणीय था।

आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड का दिल से आभारी हूं कि इस संग्रह के पांच संस्करण अब तक आ गए हैं और देश निर्मोही जी न केवल इस संग्रह के 25 वर्ष मना रहे हैं बल्कि इस पर एक आलोचना कृति भी प्रकाशित हो रही है। मैं उन सभी गुरुजनों, पत्रिकाओं के संपादकों, आलोचकों, लेखकों और पाठकों का दिल से आभारी हूं जिनकी वजह से आज कहानी विधा के परिवार में हूं। साथ उन विश्वविद्यालयों और शोध छात्रों, उनके अध्येयता मार्गदर्शकों और अनुवादकों का भी।वरिष्ठ अनुवादक और लेखिका प्रोफेसर मीनाक्षी एफ पॉल का धन्यवाद भी करना चाहूंगा जिन्होंने डॉक्टर खेमराज शर्मा जी के साथ कैंब्रिज स्कॉलर्स प्रेस लन्दन से अंग्रेजी की पुस्तक कैट्स टॉक प्रकाशित करवाई जिसमें इस संग्रह की कई कहानियां शामिल है। इसकी एक कहानी “लाल होता दरख़्त (जिसका नामकरण प्रो.कुमार कृष्ण जी ने किया था) का मीनाक्षी जी ने पहला अनुवाद किया और वह कहानी आज भी अंग्रेजी में पढ़ाई जाती है। श्रद्धेय कमलेश्वर जी का भी आभारी हूं जिन्होंने दारोश कहानी का प्रसार भारती के लिए फिल्म बनाने का चयन किया और क्लासिकल सीरीज में यह फिल्म बनी।

एस. आर. हरनोट , भारत के हिमाचल प्रदेश के एक रचनात्मक लेखक हैं। वे हिंदी और पहाड़ी भाषाओं में लिखी गई अपनी अनेक कविताओं, लघु कथाओं और उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।