सामाजिक

विश्वास एवं श्रद्धा का प्रतीक है छत्तीसगढ स्थित

राजनांदगांव से 36 किमी. की दूरी पर स्थित डोंगरगढ़ नगरी धार्मिक विश्वास एवं श्रद्धा का प्रतीक है। डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित शक्तिरूपा मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर सभी श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। यहां बम्लेश्वरी देवी को दो विख्यात मंदिर है जो बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर तक पहंचने के लिए पहाड़ी पर बनी लगभग 1000 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। बड़ी बम्लेश्वरी के समतल पर स्थिति मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। मां बम्लेश्वरी के मदिर में प्रतिवर्ष नवरात्र के समय दो बार विराट मेले का आयोजन किया जाता है।, जिसमें लाखों की संख्या में दर्शनार्थी भाग लेते है। चारों ओर हरे-भरे वनों, पहाड़ियों, छोटे-बड़े तालाबांें एवं पश्चिम में पनियाजोब जलाशय, उत्तर से ढारा जलाशय तथा दक्षिण में मड़ियान जलाशय से घिरा प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण स्थान है-डोंगरगढ़ । कामाख्या नगरी व डुगराख्य नगर नामक प्राचीन नामों से विख्यात डोंगरगढ़ में उपलब्ध खंडहरों एवं स्तम्भों की रचना शैली के आधार पर शोधकर्ताओं ने इसे कलचुरि काल का 12-13वी  सदी के लगभग का पाया है किन्तु अन्य  उपलब्ध सामाग्री जैसे-मूर्तियों के गहनें, उनके वस्त्रों आभूषणों, मोटे होंठ एवं मस्तक के लम्बे बालों की सूक्ष्म मीमांसा करने पर इस क्षेत्र की मूर्तिकला पर गोंड कला का प्रभाव परिलक्षित होता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 16वीं शताब्दी तक डुंगराख्य नगर गोंड़ राजाओें के आधिपत्य में था। गोंड़ राजा पर्याप्त सामथ्र्यवान थे, जिससे राज्य में शांति तथा व्यवस्था स्थापित थी। यहां की प्रजा भी सम्पन्न थी, जिसके कारण मूर्ति तथा गृह निर्माण कला का उपयुक्त वातावरण था। लोकमतानुसार  अब से 2200 (बाईस सौ) वर्ष पूर्व डोंगरगढ़ के प्राचीन नाम कामाख्या नगरी में राजा वीरसेन का शासन था, जो कि निःसंतान था। पुत्ररत्न की कामना हेतु उसने महिषमती पुरी (म.प्र. में मंडला) में स्थित शिवजी और भगवती दुर्गा की उपासना की, जिसके फलस्वरूप रानी को एक वर्ष पश्चात् पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों द्वारा नामकरण में पुत्र का नाम मदरसेन रखा गया। भगवान शिव एवं दुर्गा मां की कृपा से राजा वीरसेन को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी और इसी भक्ति भाव से प्रेरित होकर कामाख्या नगरी में मां बम्लेश्वरी (जगदम्बे महेश्वर) का मंदिर बनवाया गया । मां बम्लेश्वरी को जगदम्बा, जिसमंे भगवान शिव अर्थात् महेश्वर की शक्ति विद्यमान है,के रूप में जाना जाने लगा।

राजा मदनसेन एक प्रजा सेवक शासक थे। उनके पुत्र हुए राजा कामसेन जिनके नाम पर कामाख्या नगरी का नाम कामावती पुरी रखा गया।कामकन्दला और माधवनल की प्रेमकथा भी डोंगरगढ़ की प्रसिद्धि का महत्वपूर्ण अंग है। कामकन्दला राजा कामसेन के राज दरबार मंे नर्तकी थी वहीं माधवनल एक निपुर्ण संगीतज्ञ था एक बार राजा के दरबार मे कामकन्दला के नृत्य का आयोजन हुआ, परन्तु ताल व सुर बिगड़ने से माधवनल ने कामकन्दला के पैर की एक पायल में नग न होना व मृदंग बजाने वाले का एक अंगूठा नकली अर्थात् मोम का होना जैसी त्रृटि निकाली। इससे राजा कामसेन अत्यन्त प्रभावित हुए और अपनी मोतियों की माला माधवनल को भेंट की तथा कामकन्दला को पुनः माधवनल के सम्मान में नृत्य करने को कहा। कामकन्दला के नृत्य से प्रभावित हो माधवनल ने राजा कामसेन की दी हुई मोतियों की माला कामकन्दला के भेंट कर दी। इससे राजा कामसेन क्रोधित हो गया और माधवनल को राज्य से निकाल दिया परन्तु माधवनल राज्य से बाहर न जाकर डोंगरगढ़ की पहाड़ियों के बीच एक गुफा में छुप गया। इससे प्रसंगवश कामकन्दला व माधवनल के बीच प्रेम अंकुरित हो चुका था। कामकन्दला अपनी सहेली माधवी के साथ छिपकर माधवनल से मिलने जाया करती थी। दूसरी तरफ राजा कामसेन का पुत्र मदनादित्य, पिता के स्वभाव के विपरीत, नास्तिक व अय्याश प्रकृति का था। वह काकन्दला को मन ही मन चाहता था और उसे पाना चाहता था। मदनादित्य के डर से कामकन्दला उससे प्रेम का नाटक करने लगी। एक दिन माधवनल रात्रि में कामकन्दला से मिलने उसके घर चला आया और उसी वक्त मदनादित्य अपने सिपाहियों के साथ कामकन्दला से मिलने चला गया। ये देख माधवनल पीछे के रास्ते से गुफा की ओर निकल गया। घर के अन्दर से आवाजें आने कि बात पूछनें पर कामकन्दला ने बड़ी चतुराई से कहा कि वह दीवारों से बात कर रही थी। इससे मदनादित्य संतुष्ट नहीं हुआ और अपने सिपाहियों से घर पर नजर रखने को कहकर महल की ओर चला गया। एक रात्रि पहाड़ियों से वीणा की आवाज सुन व कामकन्दला को पहाड़ी की तरफ जाते देख मदनादित्य रास्ते में बैठकर उसकी प्रतिक्षा करने लगा परंतु कामकन्दला दूसरे रास्ते से अपने घर लौट गई। मदनादित्य के शक होने पर कमकन्दला को उसके घर में नदरबंद कर दिया। इस पर कामकन्दला और माधवनल माधवी के माध्यम से पत्र व्यवहार करने लगे।

माधवी को एक रोज पत्र ले जाते पकड़ लिया। डर व धन का प्रलोभन पाकर माधवी ने सारा सारा सच उगल दिया। मदनादित्य ने कामकन्दला की राजद्रोह के आरोप में बंदी बनाया । माधवनल तुरन्त इस बीच पहाड़ी से निकल भागा और उज्जैन जा पहुंचा। उस समय उज्जैन में राजा विक्रमादित्य का शासन था जो बहुत प्रतापी और दयावन था। माधवनल की करूण कथा सुन उसने माधवनल की सहायता करने की सोचकर अपनी सेना के साथ कामाख्या नगरी पर आक्रमण पर दिया। कई दिनों के घनघोर युद्ध के बाद विक्रमादित्य विजयी हुए एवं मदनादित्य, माधवनल के हाथांे मारा गया। घनघोर युद्ध से वैभवशाली कामाख्या नगरी पूर्णतः ध्वस्त हो गई। चारों ओर शेष डोंगर (पर्वत) ही बचे रहे तथा इस प्रकार डूंगराख्य नगर की पृष्ठभूमि तैयार हुई युद्ध के पश्चात् विक्रमादित्य द्वारा कामकन्दला एवं माधवनल की प्रेम परीक्षा लेने हेतु जब यह मिथ्या सूचना फैलाई गई कि युद्ध में माधवनल वीरगति को प्राप्त हुआ, तो कामकन्दला ने ताल में कूदकर प्राणोत्सर्ग किया । वह तालाब आज भी कामकन्दला के नाम से विख्यात है। उधर कामकन्दला के आत्मोत्सर्ग से माधवनल ने अपने प्राण त्याग दिये। अपना प्रयोजन सिद्ध होते न देख राजा विक्रमादित्य ने मां बम्लेश्वरी देवी (बगुलामुखी) की घोर आराघना की और अन्ततः प्राणोत्सर्ग करने को तत्पर हो गए। तब देवी ने प्रकट होकर अपने भक्त को आत्मघात करने से रोका । तत्पश्चात् विक्रमादित्य ने माधवनल कामकन्दला के जीवन के साथ यह वरदान भी मांगा कि मां बगुलामुखी अपने जागृत रूप में पहाड़ी में प्रतिष्ठित हों। तब से मां बगुलामुखी-अपभ्रंश बमलाई देवी साक्षात महाकाली के रूप में डांेगरगढ़ में प्रतिष्ठित हैं।सन् 1964 में खैरागढ़ रियासत के भूतपूर्व नरेश श्री राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह द्वारा मंदिर के संचालन का भार मां बम्लेश्वरी ट्रस्ट कमेटी को सौंपा गया था। डोंगरगढ़ के पहाड़ में स्थित मां बम्लेश्वर के मंदिर को छत्तीसगढ़ का समस्त जन समुदाय तीर्थ मानता हैै। यहां पहाड़ी पर स्थित मंदिर पर जाने के लिए सीढ़ियों के अलावा रोप वेे की सुविधा भी है। यहां यात्रियों की सुविधा हेतु पहाड़ों के ऊपर पेयजल की व्यवस्था, विद्युत प्रकाश, विश्रामालयों के अलावा भोजनालय व धार्मिक सामग्री खरीदने की सुविधा है डोंगरगढ़ रायपुर से 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित है तथा मुंबई-हावड़ा रेल मार्ग के अंतर्गत आता है।

आवास व्यवस्था:

श्री बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति, डोंगरगढ़ द्वारा संचालित धर्मशाला एवं निजी होटल उपलब्ध हैं।

कैसे पहुंचे:

वायु मार्ग: रायपुर (100कि.मी.) निकटतम हवाई अड्डा है जो मुंबई दिल्ली ,नागपुर, भुवनेश्वर, कोलकाता, रांची ,विशाखापट्नम एवं चैन्नई से जुड़ा हुआ है।

रेल मार्ग:

हावड़ा-मुंबई रेल मार्ग पर डोंगरगढ़ रेलवे जंक्शन है।

सड़क मार्ग:

रायपुर (100 कि.मी.) राजनांदगांव (36 कि.मी.) से नियमित बस सेवा एवं टैक्सियां उपलब्ध है।त