भारत के पूर्वी प्रांत पश्चिम बंगाल में सियासी संग्राम शुरू हो चुका है। क्योंकि एक ओर जहां पश्चिम बंगाल की सत्ता पर तकरीबन पन्द्रह साल से काबिज तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पुनः सत्ता को हथियाना चाह रही हैं तो वहीं भारतीय जनता पार्टी इस बार के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस व ममता बनर्जी को किसी भी सूरत में उखाड़ फेंकना चाह रही है। ज्ञात हो कि विधानसभा चुनाव इस मार्च या अप्रैल में होने हैं। क्योंकि पांच मई तक नई सरकार को शपथ लेनी होगी। जाहिर है ऐसे में पश्चिम बंगाल में वर्चस्व को लेकर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस में टकराव तेज हो गया है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस समय कई वजहों से सुर्खियों में हैं। प्रवर्तन निदेशालय से उनका टकराव हाल की बात है। उससे पहले उन्होंने एसआईआर के खिलाफ जबरदस्त आवाज उठाई और चुनाव आयोग को भी धमकाया। इन परिस्थितियों के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय को बीच आना पड़ा और उन्हें शांत किया। प्रवर्तन निदेशालय ने पश्चिम बंगाल के कोयला व्यापारी और एक प्राइवेट एजेंसी आई-पैक के दफ्तरों और अन्य ठिकानों पर मनी लांड्रिंग के मामले में छापा मारा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं वहां पहुंच कर फाइलें, लैपटॉप वगैरह उठा ले गईं तथा अपने पुलिस वालों से कहकर प्रर्वतन निदेशालय के अधिकारियों और कर्मचारियों पर एफआईआर तक दर्ज करवा दी। दरअसल, एफआईआर दर्ज करवाना ममता बनर्जी का पुराना तरीका है ताकि प्रतिद्वंद्वी पर दबाव बना रहे।

अब मामला उच्च न्यायालय और यहां तक कि उच्चतम न्यायालय में भी चला गया है। उच्चतम न्यायालय में देश के सबसे बड़े दो अधिवक्ता ममता बनर्जी की तरफ से खड़े हो गए। प्रर्वतन निदेशालय ने कोलकाता छापामारी मामले में पश्चिम बंगाल पुलिस के कामकाज में दखलंदाजी के आरोपों के बीच पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक को हटाने की मांग की। उच्चतम न्यायालय में ममता बनर्जी के वकीलों ने राज्य पुलिस द्वारा की गयी एफआईआर को न्याय संगत बताया। न्यायाधीश महोदय इस पर नाराजगी जताई और कड़े शब्दों में कहा कि यह गंभीर विषय है कि राज्य पुलिस किसी वैधानिक केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई में हस्तक्षेप कर रही है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान हर संस्था को स्वतंत्र रूप काम करने का अधिकार देता है और राज्य पुलिस को यह छूट नहीं है कि वह प्रर्वतन निदेशालय जैसी एजेंसियों के काम में बाधा उत्पन्न करें। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंतिम फैसले तक प्रर्वतन निदेशालय अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने एसआईआर के खिलाफ भी मुहिम छेड़ रखी है, जहां से उन्हें डर है कि उनके समर्थकों के नाम ज्यादा संख्या में कट न जाए। यह सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ के चलते लाखों की तादाद में बांग्लादेशी मौजूद हैं। वे खुलेआम तृणमूल कांग्रेस का समर्थन करते हैं और इसीलिए पार्टी नहीं चाहती है कि उनके नाम कटे। इसके अलावा यहां रोहिंग्या भी बड़ी संख्या में आ घुसे हैं। उन्हें भी देश से भगाने की बात की जा रही है, लेकिन ममता बनर्जी इसे स्वीकार नहीं करतीं। वामपंथी दलों और कांग्रेस के पश्चिम बंगाल में पतन के बाद अब वहां एक दशक से लड़ाई भाजपा बनाम तृणमूल कांग्रेस के बीच है।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दो चुनावों में काफी प्रयास किया, लेकिन वे तृणमूल कांग्रेस की आक्रामक नीति और प्रशासन के सहयोग के सामने जीत का बिगुल नहीं बजा पाए। इस बार पार्टी नई रणनीति के साथ गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में उतरी है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव की कमान अपने हाथों में ले ली है। गृहमंत्री अमित शाह ने दिसंबर महीने में कोलकाता जाकर वहां पहले तो अपने पार्टी संगठन से जुड़े लोगों से बातचीत की और फिर आरएसएस के कार्यकर्ताओं से मंत्रणा की। मकसद था कि दोनों संगठनों में सामंजस्य बना रहे। उन्होंने बहुत ही आक्रमणक ढंग से शुरुआत की है और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खुद से पश्चिम बंगाल पहुंच गए। उन्होंने वहां के हुगली जिले के सिंगूर में 830 करोड़ रुपए से अधिक की विकास परियोजनाओं का शुभारंभ किया। इतना ही नहीं, देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन भी पश्चिम बंगाल से ही शुरू की गई। जबकि राज्य को पहले ही लगभग आधा दर्जन अमृत भारत एक्सप्रेस सेवाएं मिल चुकी हैं। ये सभी कार्यक्रम मतदाताओं को आकर्षित करने की योजना का हिस्सा है।

भारतीय जनता पार्टी और गृहमंत्री अमित शाह की नीति रही है कि बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का हौसला बनाए रखा जाए। गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में भी यही किया और उनसे हालात का जायजा लिया। इसके साथ ही उन्होंने पार्टी के चुनींदा नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ भी गहन बातचीत की। स्थिति की समीक्षा करने और रणनीति बनाने के लिए उन्होंने भाजपा के विधायकों और सांसदों के अलावा म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के सभासदों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। पश्चिम बंगाल, जो कभी देश का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था, अब गिरावट के कारण 2023-24 में छठे स्थान पर पहुंच गया है। जीडीपी और प्रति व्यक्ति औसत आय राष्ट्रीय आय से भी घटकर नीचे आ गई है।
तृणमूल कांग्रेस को सत्ता में आए पंद्रह साल होने को हैं। पार्टी ने राज्य से वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका, लेकिन उसके बाद यहां अपेक्षित विकास नहीं हो सका। कानून व्यवस्था की स्थिति भी बद्तर हो गई। पश्चिम बंगाल में बेरोजगारी दर भी बढ़ी है। राज्य से पलायन भी तेज हुआ है। राज्य के स्कूल-कॉलेज को भी तृणमूल कांग्रेस ने राजनीति का अड्डा बना दिया है। साहित्य, कला-संस्कृति से संपन्न यह प्रदेश अपना रंगत खो रहा है। बहरहाल, सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल में तलवारें खिंच गई हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। क्रांति कुमार पाठक










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